संपादकीय@हरेश पंवार -9 सितंबर 2026

सुविधाएं इंसान को आराम दे सकती हैं, लेकिन संघर्ष ही उसे काबिल और जिम्मेदार बनाता है। आज का दौर बाजारवाद और भौतिक प्रतिस्पर्धा का दौर है। दुनिया में शायद ही ऐसी कोई वस्तु हो जिसे धन के बल पर खरीदा न जा सके। महंगे कपड़े, आलीशान मकान, आधुनिक वाहन, सुख-सुविधाओं के साधन और प्रतिष्ठा का दिखावा—सब कुछ बाजार में उपलब्ध है। लेकिन मनुष्य के व्यक्तित्व की कुछ ऐसी पूंजी भी है, जिसकी कोई कीमत तय नहीं की जा सकती। काबिलियत, चरित्र, संस्कार और बड़प्पन ऐसी ही अमूल्य संपत्तियां हैं। यहां मैं बोलूंगा तो फिर कहोगे कि बोलता है।

इन गुणों को किसी दुकान से खरीदा नहीं जा सकता और न ही किसी पद या धन के बल पर हासिल किया जा सकता है। इनके लिए व्यक्ति को जीवन की जिम्मेदारियों की भट्टी में तपना पड़ता है।

काबिलियत केवल डिग्री हासिल करने या बड़े पद पर पहुंच जाने का नाम नहीं है। वास्तविक काबिलियत तब सामने आती है, जब व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी सही निर्णय लेने की क्षमता रखता है। परिस्थितियां प्रतिकूल हों, साधन सीमित हों और रास्ते में बाधाएं खड़ी हों, तब भी जो व्यक्ति अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटता, वही वास्तव में काबिल कहलाने का अधिकारी है।

जीवन में जिम्मेदारियां कभी आसान नहीं होतीं। परिवार की जिम्मेदारी हो, रोजगार की हो, समाज की हो या किसी पद की—हर जिम्मेदारी व्यक्ति की परीक्षा लेती है। कई बार परिस्थितियां हमें ऐसे निर्णय लेने के लिए मजबूर करती हैं, जिनमें अपनी सुविधा छोड़कर दूसरों के हित को प्राथमिकता देनी पड़ती है। यही क्षण व्यक्ति के चरित्र का निर्माण करते हैं।

संघर्ष व्यक्ति को तोड़ने के लिए नहीं, उसे गढ़ने के लिए आता है। जिस तरह सोने को आभूषण बनने से पहले आग में तपना पड़ता है, उसी प्रकार मनुष्य की प्रतिभा और व्यक्तित्व भी संघर्ष की आग में तपकर निखरते हैं। जो व्यक्ति हर कठिनाई से बचने का रास्ता खोजता है, वह शायद आरामदायक जीवन तो जी सकता है, लेकिन जीवन की बड़ी जिम्मेदारियों को संभालने की क्षमता विकसित नहीं कर पाता।

इसके विपरीत, जो व्यक्ति कठिनाइयों को चुनौती के रूप में स्वीकार करता है, असफलताओं से सीखता है और हर परिस्थिति में आगे बढ़ने का प्रयास करता है, उसके भीतर धीरे-धीरे आत्मविश्वास, धैर्य और निर्णय लेने की क्षमता पैदा होती है।
यही काबिलियत की असली पाठशाला है।

लेकिन केवल काबिल होना पर्याप्त नहीं है। समाज को ऐसे लोगों की आवश्यकता है, जिनके पास योग्यता के साथ-साथ बड़प्पन भी हो। क्योंकि काबिलियत व्यक्ति को ऊंचाई तक पहुंचा सकती है, लेकिन बड़प्पन ही उसे उस ऊंचाई पर टिकाए रखता है।

बड़प्पन का अर्थ केवल बड़े पद पर बैठना या दूसरों से अधिक धनवान होना नहीं है। बड़प्पन तो उस व्यवहार का नाम है, जिसमें व्यक्ति अपनी सफलता के बावजूद दूसरों का सम्मान करना नहीं भूलता। जो अपने से कमजोर व्यक्ति के साथ भी सम्मान से बात करे, अपनी शक्ति का दुरुपयोग न करे, गलती होने पर उसे स्वीकार करे और आवश्यकता पड़ने पर दूसरों की मदद के लिए आगे आए—वास्तविक अर्थों में वही बड़ा इंसान है।

हमारे इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जिन्होंने सुविधाओं के बजाय संघर्ष को चुना और अपनी जिम्मेदारियों को अपनी शक्ति बना लिया। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अत्यंत विषम सामाजिक परिस्थितियों में शिक्षा हासिल की और ज्ञान को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। महात्मा ज्योतिबा फुले ने सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध संघर्ष करते हुए शिक्षा और समानता की मशाल जलाए रखी। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने साधारण परिस्थितियों से निकलकर अपनी प्रतिभा, अनुशासन और मेहनत के बल पर देश के सर्वोच्च पदों में से एक तक पहुंचकर युवाओं के लिए प्रेरणा का उदाहरण प्रस्तुत किया।

इन महान व्यक्तित्वों की सफलता के पीछे केवल प्रतिभा नहीं थी, बल्कि जिम्मेदारी के प्रति गहरी प्रतिबद्धता थी।

आज की पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह सफलता तो जल्दी चाहती है, लेकिन उसके लिए आवश्यक संघर्ष से बचना चाहती है। सोशल मीडिया ने सफलता का एक ऐसा चमकदार चेहरा हमारे सामने प्रस्तुत कर दिया है, जिसमें उपलब्धि तो दिखाई देती है, लेकिन उसके पीछे छिपी वर्षों की मेहनत, असफलताएं, त्याग और संघर्ष दिखाई नहीं देते।

युवा यह समझें कि किसी की सफलता देखकर उससे ईर्ष्या करने के बजाय उसके संघर्ष से सीखना चाहिए। जीवन में मिलने वाली हर जिम्मेदारी को बोझ समझने के बजाय उसे अपने व्यक्तित्व को निखारने का अवसर मानना चाहिए।

माता-पिता की जिम्मेदारी, परिवार की जिम्मेदारी, समाज के प्रति जिम्मेदारी और अपने पेशे के प्रति ईमानदारी—यही वे कसौटियां हैं, जिन पर व्यक्ति का वास्तविक चरित्र तैयार होता है।

इसलिए जीवन में यदि कभी परिस्थितियां कठिन हो जाएं तो उनसे घबराइए मत। संभव है कि वही कठिन समय आपके व्यक्तित्व को उस ऊंचाई तक पहुंचाने की तैयारी कर रहा हो, जहां आपकी योग्यता और बड़प्पन दोनों दिखाई देंगे।

काबिलियत किताबों से शुरू हो सकती है, लेकिन जिम्मेदारियों से निखरती है। बड़प्पन संस्कारों से जन्म ले सकता है, लेकिन त्याग और संघर्ष से सिद्ध होता है।

अंततः जीवन का मूल्य इस बात से तय नहीं होता कि हमने कितना धन कमाया, कितनी सुविधाएं जुटाईं या कितनी बड़ी कुर्सी हासिल की। असली मूल्य इस बात का है कि हमें मिली जिम्मेदारियों को हमने कितनी ईमानदारी से निभाया और अपनी सफलता के बावजूद इंसानियत को कितना बचाए रखा। हमेशा याद रखिए—
“सुविधाओं में पला व्यक्ति सफल हो सकता है, लेकिन जिम्मेदारियों में तपकर निकला व्यक्ति ही वास्तव में काबिल और बड़ा इंसान बनता है।”